वक्त हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। यह कोरोना काल भी हमें बहुत कुछ सिखाने
आया है और सिखा भी जाएगा। बहुत कुछ नसीहतें हमारे दामन में चुपके-से अपना स्थान
बना लेंगी। लेकिन आज यह वक्त हमसे कुछ माँग भी कर रहा है। हमसे कुछ कहना चाहता है।
मन-ही-मन। चुपके-से। वर्तमान में हम जीवन की आपाधापी में हैं। हड़बड़ी में हैं। बहुत
कुछ पाने की लालसा भी है मन में। अकेले-अकेले। खुद के लिए। हम बहुत कुछ बनने की
चाह में बहुत आगे भी निकल गए हैं। इस प्रक्रिया में सबसे पहले हमने अपने परिवार को
खोया-छोड़ा। बिसराया। बड़ों की सीख ठुकराई, उन्हें नजरंदाज किया, उनके साये से पिंड छुड़ाया। छोटों के प्यार को तिलांजलि दी। यारों-दोस्तों
से मतलब निकाले। 'अपनी ढपली, अपना राग'
की चेष्टा में महत्वाकांक्षा के घोड़े पर सवार हो गए।
'मियां-बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी'
- सूत्र को जीवन की खुशी का महामन्त्र मान बैठे। इस सूत्र का
अपने-अपने हिसाब से अर्थ लिया और निकल लिए अपनी-अपनी राह पर। बहुत आगे। एकल परिवार
की राह पर। 'छोटा परिवार, सुखी परिवार'
और 'हम दो, हमारे दो'
नारे के प्रति कमर कस ली। इतने से भी मन नहीं भरा तो इस छोटे परिवार
को भी छोटा करने की ठानी। 'शेर का बच्चा, एक ही अच्छा' पर आकर विराम लेने की सोची। इतने में
पश्चिम से आये हुए एक विचार के वशीभूत होकर 'लिव-इन-रिलेशनशिप'
की गिरफ्त में आ गए। फिर अलग-थलग...! अब क्या बचा ? सबकुछ तो पहले ही छोड़ दिया... अब कुछ नहीं बचा, सिवाय
हाथ मलने के ! अब मलो हाथ ! क्या यही डगर थी हमारी -
तुम तो सपनों के
सौदागर थे
क्या तुम्हारी यही
डगर थी ?
तुम तो नई राहों के
अन्वेषी थे
न राह निश्चित थी
न चलने का हुनर निश्चित
था
बस, चल पड़े थे कदम
एक जुनून लेकर मन
में
उम्मीद का एक टिमटिमाता
‘दीया’ लेकर ।
उम्मीद का दिया अब भी टिमटिमा रहा है। समझ का पिटारा अभी भी थोड़ा-सा खुला
हुआ है। देर अभी भी नहीं हुई है। क्या आपको नहीं लगता कि अपने परिवार के पास लौटना
ही एकमात्र विकल्प है ? अपने जीवन के संस्कारों को सहेजने,
बचाने और जीने का। एकांगीपन से निजात पाने का। सिर्फ पति-पत्नी और बच्चे से परिवार
नहीं बनता। परिवार बनता है बृहतर संबंधों से। जो हमारे जन्म के समय से पहले ही
हमसे जुड़ जाते हैं। भारतीय परिवार की संकल्पना बृहत है और मजबूत भी। जहाँ आदमी कभी
न टूटता है और न बिखरता है। न कभी अकेला होता और न ही कभी कमजोर होता है। परिवार
व्यक्ति को मजबूत बनाता है। सामंजस्य, त्याग, समर्पण व परहित जैसे गुणों का स्रोत और विकास स्तम्भ परिवार ही है। परिवार
ही वह इकाई है जहाँ व्यक्ति के दोषों का निवारण करता है। परिवार से लोकाचार जुड़े
रहते हैं। परिवार परम्पराओं-लोकाचारों को सहेजता है, सँवारता
है और आगे हस्तांतरित भी करता है। हमारी परम्पराओं-लोकाचारों में जीवन भी सुरक्षित
है और प्रकृति भी। हमें जीवन भी बचाना है और प्रकृति को सहेजना भी है। दोनों को
सहेजना-सँवारना बेहद जरूरी है। इसके लिए हमें परिवार को बचाना है। ध्यान रखिए,
परिवार छूटा तो हमारे जीवन रूपी भवन की नींव का एक पत्थर
छूटा-हिला-टूटा...! यह अपना-अपना सच है !
अब आता है गाँव। अपना गाँव, अपना देश। परिवार छूटा तो गाँव भी
छूटा। यह सच है कि बहुत सारे लोग गाँव छोड़ चुके हैं। लेकिन गाँव ने हमें नहीं छोड़ा
-
मैं गाँव हूँ
भारत देश का
मैंने कभी नहीं दिया
'देश निकाला'
अपने लोगों को!
गाँव अब भी बुलाता है। शहर नहीं। यह सच है। मन के अंदर का। गाँव नहीं छूटा।
यह तसल्ली मन में संतोष भरती है। अब तो और ज्यादा। गाँवों से शहरों में होता पलायन
मजबूरी है या सुविधापरस्ती। शहर खींच लाई आगे पढ़ने की ललक, बेरोजगारी, कॉम्पिटिशन की तैयारी, एक अदद नौकरी की तलाश। फिर
शहरों में ही बसने की बलवती इच्छा। इन सबके बीच जीवन के कुछ सुविधाभोगी अनुभव।
सुविधापरस्त जीवन की अटूट चाह। बड़ा दिखने-बनने की सनक। शहरी बाबू की ठसक। औरों से
अलग दिखने की लालसा। जो यूँ दिखाई देती है -
लोग खुद ही निकल-निकलकर
जाते रहे शहर
नगर, महानगर, परदेश
तलाशते रहे नई जमीन
अपनी जमीन छोड़कर!
कोई फ्लैट में बसा
कोई डुप्लेक्स विला में
कोई अपार्टमेंट हाउस में
कोई किराये पर खोजता रहा
कोई झुग्गी-झोंपड़ी में
ढूंढ़ता रहा अपना आशियाना !
वह सब हुआ जो सोचा था। या सोचा नहीं था। विकास की सभी दहलीज़ों को नापते हुए
शहर नगर बने। नगर महानगर बने। अंधाधुंध व्यापार-कारोबार पनपे। प्रदूषण बढ़ा। गलघोटू
शोर-शराबा। भीड़भाड़। कालोनियों कटी-बनी। पशु-पक्षी, जीव-जंतु, जंगल
सब इसकी चपेट में आये। जो होना था, हुआ। पर, आज जो नहीं होना था, वह हो रहा। हमने प्रकृति को
चुनौती दी। प्रकृति अब हमें चुनौती दे रही है। हमने प्रकृति से दो-दो हाथ किये। अब
वह हमसे चार-चार हाथ कर रही है। हमने प्रकृति को भुला दिया। अब वह हमें भुलाने की
तैयारी क्यों न करे ? हमने संयम खोया। भोग अपनाया। ऐसे समय
में हमें फिर अपने गाँव याद आये। वहाँ का रहन-सहन, खान-पान,
चाल-चलन, बोली-बातचीत, व्यवहार
आदि सबकुछ एक चलचित्र की भाँति मन-मस्तिष्क में घूमने-फिरने लगा –
सब बस गए
अपनी मर्जी के मालिक बन गए
पर, शहर भी शहर ही ठहरा
अपनी तासीर नहीं छोड़ी
लौटा दिए बसे हुए लोग
अपने-अपने गाँव को !
जो गए थे शहर में बसने
रोजगार की तलाश में
वे आज लौट रहे हैं अपने गाँव
अपनी जमीन पर
अपने पुश्तैनी घर
अपनी बची जिंदगी को बचाने !
सब बदल गए
शहर बदल गया
लोग बदल गय
जीवन के मानक बदल गये
नहीं बदला तो सिर्फ गाँव
भारत देश का गाँव!
मैं गाँव हूँ
भारत देश का
मैं कभी नहीं देता 'देश निकाला'
मैं तो बसाता हूँ लोगों को
'मिनख' बने रहने
के लिए
मिनख बचे रहे तो
यह जीवन भी बचा रहेगा!
जननि (माँ) और जन्मभूमि की याद आना स्वाभाविक है। जब श्रीराम ने रावण को
युद्ध में परास्त कर वध किया। विभीषण को राज सिंहासन पर बैठाया। तब लक्ष्मण ने
श्रीराम से स्वर्णमयी लंका में कुछ दिन और रुकने का आग्रह किया, तब श्रीराम ने कहा "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"।
श्रीराम ने कहा कि लंका भले ही सोने की हो, पर जननी और
जन्मभूमि दोनों का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है। यह जीवन को संयम की ओर लौटाने
का संकल्प है। यह जीवन को प्रकृति के साथ, अपने गाँव के साथ
सहचर भावना से जोड़ने का संकेत है। यह अपना-अपना सच है !
माँ(परिवार), मातृभूमि और मातृभाषा
से व्यक्ति की पहचान बनती है। कठिन से कठिन समय में, अच्छे
से अच्छे समय में यदि हमने इन तीनों से वास्ता न तोड़ा, जोड़े
रखा इनसे अपने को तो पराजय नहीं, विजय होती है।
इस कोरोना के कारण आज न जाने किस संयोग-दुर्योग से घर में रहने का अवसर आया
है। नहीं तो लोग न जाने कैसे-कैसे, कितने-कितने जतन करते हैं घर पर रहने
के लिए। घर जाने के लिए। और देखिए, अब यह संयोग खुद आपके पास
चलकर आया है। स्वीकार कीजिए इसे। अपनाइए इसे। अपने घर में अपने लोगों से मिलिए।
बतियाईये। अपने गाँव में, अपने घर-परिवार के लोगों से अपनी
बोली-भाषा में बतियाने का अवसर आपको अपने करीब ले जायेगा। जान लीजिए, यह संकट हमें लोक-प्रकृति की महत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए चेता रहा
है। अब भी न चेते तो, कभी नहीं...! यह भी अपना-अपना सच है !
अब तक सुनते-पढ़ते ही आए थे कुछ महामारियों के बारे मे। देखा नहीं था। बचपन
में बाबा सुनाया करते थे, अपने समय की कुछ प्राकृतिक आपदाओं के बारे में। बाढ़,
सूखा-अकाल या प्लेग-हैजा। उस समय के मानवीय जिजीविषा के अनूठे
किस्से उनकी जुबान पर हुआ करते थे। जिनसे वे उस समय की आपदाओं, चुनौतियों से पार पाते थे। लोक दृष्टि से अपने समय के संकट, विपदाओं-आपदाओं से पार पाने का अनूठा तरीका उनके पास हुआ करता था। काफी हद
तक। आप यहाँ यह कह-सोच सकते हैं कि यह कैसे संभव है...पर, यह
लोक चेष्टा से सम्भव है !
ठीक ऐसे समय में फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'पहलवान की ढोलक' याद आती है। कहानी में महामारी से बचने, जूझने,
विजय पाने के लिए 'लुट्टन' पहलवान अपने दो जवान बेटों की मौत के बाद भी पूरी-पूरी रात जगकर ढोलक
बजाता है। यह ढोलक वहाँ के पूरे लोगों में महामारी से लड़ने-जूझने की ताकत पैदा
करती है। साहस भरती है। निराशा में आशा का संचार करती है। आप फिर यहाँ यह कह-सोच
सकते हैं कि यह कैसे संभव है...पर, यह साहित्य चेष्टा से
संभव है !
आज का सच भी किसी छुपा नहीं है। आज परीक्षा की घड़ी है - पूरे विश्व के लिए, देश के लिए। मानवता के
वजूद को जिंदा रखने के लिए। एक वैश्विक महामारी-कोरोना का आतंक, डर, भय सबके सिर नाच रहा है। हम 21 वीं सदी में जी रहे हैं। यह तो मानते ही हैं कि यह समय विज्ञान और तकनीकी
का युग है। यह महामारी भी इसी युग की है। यही से पैदा हुई है। संकट भी इसी युग का
है, तो समाधान भी इसी युग को खोजना है। खोजेगा भी। यह भी सच
है। पर, इस संकट के समाधान का रास्ता हमारी परंपरा, लोक चेष्टा, साहित्य चेष्टा से प्रेरित हो, ऊर्जस्वित हो आविष्कार करेगा...यह विज्ञान चेष्टा से संभव है !
यह भी हमें जान लेना चाहिए कि मनुष्यता का यह सिद्धांत है कि हम अपने लिए
नहीं, दूसरों के लिए जीते
हैं। खुद जीकर। तो, आज भी हमें पहले खुद बचना है। यदि हम बचे
तो जग बचेगा। मनुष्यता बचेगी।
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